कला/संस्कृति/साहित्य

20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे श्रीकांत वर्मा : अशोक वाजपेयी

–      प्रख्यात साहित्यकार व कवि स्व. श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि विश्व हिंदी परिषद और श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट द्वारा भव्य कार्यक्रम का आयोजन

देश के प्रख्यात साहित्यकार, कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि के अवसर पर सोमवार को नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में ‘विश्व हिंदी परिषद’ एवं ‘श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट’ द्वारा ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने स्व. श्रीकांत वर्मा के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी वैचारिक विरासत पर अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम का आरंभ संचालक डॉ. हर्षबाला द्वारा स्व. श्रीकांत वर्मा के जीवन, साहित्यिक अवदान, पत्रकारिता तथा राजनीतिक योगदान के परिचय से हुआ। विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए स्व. श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान का स्मरण किया। इस अवसर पर श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से डॉ. अभिषेक वर्मा ने उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्रीकांत वर्मा की पुस्तक ‘मगध’ और स्वर्ण मिश्रधातु से निर्मित उनकी प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में स्व. श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।

डॉ. विपिन कुमार ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीकांत वर्मा ने अपने समय की पीड़ा, लोगों की वेदना और सत्ता की खामोशी को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। सत्ता के नजदीक रहते हुए भी उन्होंने सत्ता से सवाल करने का साहस किया। वे अतीत में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखते थे। वे भारतीय संस्कृति में विश्वास करते थे और देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था। डॉ. विपिन कुमार ने श्रीकांत वर्मा को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने के मांग करते हुए कहा कि इस सम्बंध में भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।

डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा से जुड़ी स्मृतियों तथा ‘श्रीकांत वर्मा सम्मान’ की जानकारी साझा की। उन्होंने अपने पिता श्रीकांत वर्मा के आखिरी दिनों को याद किया। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले पांच पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में दिए जाएंगे। ये पुरस्कार 18 सितंबर को श्रीकांत वर्मा जी के जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किए जाएंगे। इन पुरस्कारों में साहित्य के क्षेत्र में शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक है।

मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री अशोक वाजपेयी ने स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी के साथ बिताए समय को याद करते हुए कहा कि श्रीकांत वर्मा एक लड़ाकू कवि थे। वो हिंदी के पहले सबसे नाराज़ कवि थे। वे अपने नरक में अकेले थे। वे 20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे। प्रख्यात साहित्यकार एवं कला समीक्षक श्री विनोद भारद्वाज ने कहा कि श्रीकांत वर्मा के तेवर अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिल्कुल अलग थे। श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए विनोद भारद्वाज ने कहा कि दुनिया बदल जाती हैं, लेकिन स्मृतियां रह जाती हैं।

वहीं जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी ने ‘श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर’ विषय पर केंद्रित व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने श्रीकांत वर्मा की वैचारिक प्रखरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, श्रीकांत जी बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। जब दिनमान की पत्रकारिता को याद करते हैं, तो वे बहुत याद आते हैं। वो पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे। आज जिस तरह की पत्रकारिता है, उसमें श्रीकांत वर्मा और भी याद आते हैं।

कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक श्री रवीन्द्र त्रिपाठी ने श्रीकांत वर्मा से अपनी मुलाकातों को याद किया। उन्होंने साहित्य तथा पत्रकारिता के अंतर्संबंधों को उजागर करते हुए कहा, समाज में जो हो रहा है, उसको जानने का माध्यम पत्रकारिता है। पत्रकारिता और आधुनिक साहित्य का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा है। एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार अदिति राजपूत ने समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा पर बोलते हुए कहा, श्रीकांत शर्मा ने हमें बताया कि पत्रकारिता एक उद्योग नहीं है, यह लोक चेतना है।

प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने ‘कथा एवं साहित्य’ पर बात करते हुए कहा, किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी के साथ और संवेदना के साथ अपनी बात कहना बड़ा कठिन होता है। श्रीकांत वर्मा के गद्य में उनकी सहृदयता परिलक्षित होती है। उनके साहित्य में युगबोध और कालबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की कुंठा को चित्रित किया है। उनके लेखन में राष्ट्र सर्वोपरि रहा है। कार्यक्रम के अंत में, प्रसिद्ध आलोचक प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम साहित्य, पत्रकारिता और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के अमूल्य योगदान को स्मरण करने का एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ।

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