दिल्ली के श्रीराम सेंटर में ‘संझा’ की चमक


राजेश कुमार
शाम और रात के बीच जो गोधूलि का वक्त होता है, उसमें काफी चमक व चटख रंग होता है। वह शांत, उदास नहीं होता है। उसमें विरोध भी होता है और कुछ कुछ गुस्सा भी। 12 जून को श्रीराम सेंटर के ऑडिटोरियम में इसी संझा को एकल रूप में प्रस्तुत किया गया। यह एकल मूलतः किरण सिंह की कहानी ‘संझा’ पर आधारित है। यह हंस में प्रकाशित हुई थी। प्रकाशित होने के बाद से ही यह कहानी चर्चा में आ गयी थी। यह कहानी कई बार नाटक के रूप में मंचित हो चुकी है। यहां तक कि इस पर शॉर्ट फ़िल्म भी बन चुकी है और इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होकर सम्मानित भी चुकी है।

यह एकल के रूप में पहली बार trust द्वारा मंचित किया गया। इसको निर्देशित किया है राजेश तिवारी ने। आजकल दिल्ली में हिंदी रंगमंच में राजेश तिवारी अपनी विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के कारण काफी चर्चा में है। उन्होंने किरण सिंह की दूसरी कहानियों का भी मंचन किया है। उनके मंचन की खूबी ये है कि वे केवल किसी कहानी को कहानी की तरह नहीं रखते हैं, उसके टेक्स्ट को पकड़ने की कोशिश करते हैं। यहां तक कि सब-टेक्स्ट में जो होता है, उसे भी सामने लाने में सफल होते हैं।
संझा की कहानी थर्ड जेंडर के चरित्र पर केंद्रित है। अभी भी पुरुष प्रधान समाज इसे सम्मान की नजर से नहीं देखता है, एक अपशकुन की तरह देखता है। उसे छिपाने की कोशिश करता है।

इस कहानी को मनीष शर्मा ने एकल रूप में प्रस्तुत किया है। इसमें कहानी के बिम्बों और प्रतीकों को मनीष शर्मा ने अपने शारीरिक मुद्राओं और हाव-भाव से इतने सफल ढंग से प्रस्तुत किया कि दर्शकों तक सहज संप्रेषित हो सका। राजेश तिवारी का निर्देशन इतना सधा हुआ था कि संझा की त्रासदी तो सामने आता ही है, उसके अंदर का प्रतिकार भी अंत तक आते-आते खुल कर सामने आ जाता है और उस पितृसत्तामक समाज को खुल कर चुनौती देता है।

कहानी को नाटक के रूप में ढालने में बेहतरीन मंच सज्जा और राघव प्रकाश तथा दिव्यांश की प्रकाश परिकल्पना की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस प्रस्तुति से दिल्ली के रंगमंच में निर्देशक राजेश तिवारी और अभिनेता मनीष शर्मा एक चमकते हुए सितारे की तरह दिखते हैं और भविष्य में सुखद संभावनाएं जगाते हैं।
(लेखक राजेश कुमार प्रसिद्ध नाटककार हैं।)




