खासम-ख़ास

अगले जनम मोहे किसान न कीजो..

भारत में किसान बहुत मजबूर हैं, इतना कि कहानी बन जाता है।

एक: औलाद को गिरवी रखता है। मध्यप्रदेश, खरगौन का मोहनपुरा गांव। इसी मार्च में तब एकाएक सुर्खियों में आया जब किसान लाल सिंह ने सूखे से फसल बचाने, ट्यूबवेल खुदाने तीन मासूम औलादों को साहूकार के पास गिरवी रखा।

दुर्भाग्य, जबर्दस्त बारिश हुई फसल अतिवृष्टि से चौपट। दोहरी मार से आहत लाल सिंह बच्चों को नहीं छुड़ा पाया। साहूकार ने पैसे वसूलने, बच्चों को राजस्थान से गाडर चराने आए भूरा गड़रिया को दे दिया। वहां प्रताड़ना से तंग बेजू (11) और टेसू (13) रात के अंधेरे में भाग लिए। किसी कदर 47 किलोमीटर पैदल चलकर रेल लाइन के किनारे-किनारे टिमरनी पहुंचे। कुछ भले लोगों की नजर पड़ी, पुलिस को खबर हुई तो खुलासा हुआ कि भूरा के पास दोनों का एक भाई अभी भी है।

स्वाभिमानी मुकेश (14) का लौटने से इंकार और कहना, पहले सेठ से पिता के वायदे को निभाएगा, पिता और भाइयों का कर्ज चुकाएगा, फिर घर आएगा।

दो: कमर सहित नीचे डूबकर लगातार महीनेभर ‘जल सत्याग्रह’। मध्यप्रदेश के खंडवा का खोगलगांव, देश का पहला जलसत्याग्रही गांव। वर्ष 2012 में 17 दिनों तक ‘जल सत्याग्रह’ हुआ, इस साल 32 दिन। सरकार ने आश्वासन नहीं दिया ‘आप’ पार्टी के हस्तक्षेप से सत्याग्रह खत्म हुआ।

किसान ओंकारेश्वर बांध परियोजना में 191 मीटर जल भरने का नुकसान गिना रहे, जमीन के बदले उचित जमीन और सही मुआवजे की वाजिब मांग। चमड़ी गलती है, फिर भी सरकार नहीं सुनती। उल्टा आंदोलन समाप्ति पर जले में नमक छिड़क एसडीएम कहते हैं, “अपनी मर्जी से शुरू आंदोलन, अपनी मर्जी से हुआ खत्म, लेकिन सरकार की सहानुभूति किसानों से है, न्याय जरूर मिलेगा।” कब इसकी कोई समय-सीमा नहीं।

तीन: मार्च-अप्रैल का महीना। जहां-तहां बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और खेतों में भीगता तैयार पका अनाज। किसान मुश्किल में, देश में 80 से 85 लाख हेक्टेयर में रवी फसल की बर्बादी संभावित। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा कोष से किसानों को दी जाने वाली मदद में नुकसान का आंकड़ा 50 फीसदी से घटाकर 33 किया।

चार: अभी 30 सितंबर को सरकारी तौर पर मानसून समाप्त। 36 मौसम उपकेंद्रों में 17 सूखे की चपेट में यानी 614 जिलों में 302 सूखा पीड़ित। 39 फीसदी भूभाग की 66 करोड़ जनसंख्या का सूखे से सामना। महाराष्ट्र-मराठवाड़ा के तीन जिले उस्मानाबाद, बीड, लातूर में सदी का सबसे भयंकर सूखा। आधा महाराष्ट्र सूखे की चपेट में।

किसानों की मौजूदा आत्महत्याओं का आंकड़ा 400 के पार। 35 फीसदी खाद्यान्न हिस्सेदारी वाले हरियाणा में छठा और पंजाब में पांचवां सूखा साल। बिहार 4 साल से मौसम की बेरुखी का शिकार। अब तक 20 फीसदी कम बारिश, 19 जिलों में औसत से भी कम। उप्र में 10 साल में सबसे कम बारिश। 48 जिलों में 40 प्रतिशत से भी कम। उत्तराखंड में 23 प्रतिशत, मप्र के 19 जिलों की स्थिति बहुत खराब।

झारखंड के 24 में 12 जिलों में कम बारिश। यहां किसान मानसून पर निर्भर है। कर्नाटक की सूखे से निपटने, राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया कोष (एनडीआरएफ) से 3050.72 करोड़ रुपयों की वित्तीय सहायतार्थ गुहार।

पांच: लगातार दूसरा सूखा साल। हालात 115 साल के इतिहास में चौथी बार। 2014, मानसून के दौरान तब भी सामान्य के मुकाबले 88 फीसदी औसत बारिश हुई। 2015, दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 22 फीसदी कम, मध्य भारत में 17 फीसदी, उत्तर-पश्चिम भारत में 13 और पूर्व व उत्तर-पूर्व भारत में सामान्य के मुकाबले 2 प्रतिशत कम बारिश। 1 जून से 4 सितंबर तक 645.7 मिलीमीटर औसत बारिश जो सामान्य के मुकाबले 87 फीसदी ही है। भारत मौसम विभाग 90 फीसदी से कम बारिश को सूखे की स्थिति मानता है। आशंका खाद्यान्न उत्पादन 4.7 फीसदी घटेगा।

मानसून गया। उमस, तपन जेठ-बैसाख सी। सावन-भादो सूखे गए। स्थिति विकट, दाल 200 रुपये के करीब। चौतरफा मंहगाई रंग दिखाने को बेताब, आसमान छुएंगे भाव। किसान औलाद गिरवी रखे, फसल अतिवृष्टि या अनावृष्टि, किससे बचाने को? कृषि कायाकल्प की बातें कोरी। जबरदस्त प्राकृतिक आपदा फिर भी तत्काल उचित मुआवजा नहीं। बड़ी हकीकत, पलायन शौक नहीं नियति बना।

जल आयोग के आंकड़े, 61 प्रतिशत जलस्रोतों में पानी की कमीं जो 77 प्रतिशत आरक्षित जल की तुलना में दशक में सबसे कम। यानी आसमानी सूखा और भूगर्भ भी सूखा।

सवाल: एक, पलायन का बोझ सहकर कितने महानगर किसानों का पेट भरेंगे?

सवाल: दो, अन्नदाता रोजगार तलाशने बाहर, खेत सूने, अनाज उत्पादन कैसे बढ़ेगा? गंभीर सच, देश के समक्ष यक्षप्रश्न, पर अनुत्तरित, और पता नहीं कब तक? ‘जय किसान’ का नारा कितना प्रासंगिक, नहीं पता। पता है तो बस इतना कि हर रोज किसान भगवान से एक ही विनती करता है, ‘अगले जनम मोहे किसान न कीजो।’

ऋतुपर्ण दवे

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