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स्मार्ट सिटी परियोजना: बदलेगा शहरों का स्वरूप

क्या आप किसी वैसे शहर की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी सड़कों पर स्थित हर खंभे पर कैमरे लगे हों, रात में पैदल यात्री के उपस्थित होने पर बल्ब स्वत: जल जाए, अन्यथा डिम हो जाए, सूर्य की रोशनी के अनुरूप घरों की लाइटें घटाई बढ़ाई जा सकें और शिक्षक की गैर-हाजिरी पर किसी दूसरे स्कूल का शिक्षक वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये पढ़ा सके।

मोदी सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना इसी कल्पना को साकार करने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने शहरी भारत को रहन-सहन, परिवहन और अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के इरादे से तीन महत्वाकांक्षी योजनाओं- स्मार्ट सिटीज, अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) और सभी को आवास योजना का हाल ही में शुभारंभ किया है। इन परियोजनाओं से देशवासियों की उम्मीदों को नई उड़ानें मिलती नजर आ रही है और सपनों को संजीवनी।

शहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने, स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराने, परिवहन व्यवस्था को सुधारने, शहरों की छवि खराब करती झुग्गी झोपड़ियों को हटाने तथा उनमें रहने वाले लोगों को वैकल्पिक सुविधा मुहैया कराने के लिए शहरी संसाधनों, स्रोतों और बुनियादी संरचनाओं का सक्षम ढंग से विकास करना स्मार्ट सिटी परियोजना का प्रमुख मकसद है। इन परियोजनाओं के तहत 2022 तक सभी को आवास उपलबध कराने का लक्ष्य भी है।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की वर्तमान जनसंख्या की लगभग 31 फीसदी आबादी शहरों में बसती है और इनका सकल घरेलू उत्पाद में 63 फीसदी का योगदान है। ऐसी उम्मीद है कि वर्ष 2030 तक भारत की आबादी का 40 फीसदी हिस्सा शहरों में रहेगा और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 75 प्रतिशत का होगा। इसके लिए भौतिक, संस्थागत, सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे के व्यापक विकास की आवश्यकता है। 

ये सभी जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने एवं लोगों और निवेश को आकर्षित करने, विकास एवं प्रगति के एक बेहतर चक्र की स्थापना करने में महत्वपूर्ण हैं। स्मार्ट सिटी का विकास इसी दिशा में एक कदम है।

इस मिशन में 100 शहरों को शामिल किया जाएगा और इसकी अवधि पांच साल (2015-16 से 2019-20) की होगी। उसके बाद शहरी विकास मंत्रालय द्वारा मूल्यांकन किए जाने एवं प्राप्त अनुभवों को शामिल किए जाने के साथ मिशन को जारी रखा जा सकता है। 100 स्मार्ट शहरों की कुल संख्या एक समान मापदंड के आधार पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच वितरित की गई है। इस वितरण फार्मूला का इस्तेमाल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिए अमृत के तहत धनराशि के आवंटन के लिए भी किया गया है।

शहरी विकास मंत्रालय ने यह तय कर दिया है कि देश के किस राज्य से कितने शहर स्मार्ट सिटीज प्रोजेक्ट के लिए चुने जाएंगे, जिसमें से सबसे ज्यादा 13 स्मार्ट सिटीज उत्तर प्रदेश में होंगी। 

तमिलनाडु के 12 और महाराष्ट्र के 10 शहरों को स्मार्ट सिटीज के तौर पर विकसित किया जाएगा। मध्य प्रदेश के सात और गुजरात और कर्नाटक के छह-छह शहर स्मार्ट सिटी बनेंगे। कुल मिलाकर देशभर में 100 स्मार्ट सिटीज विकसित करने की योजना है, लेकिन प्राथमिकता किसे मिलेगी, ये इंटर-सिटी कंपिटीशन में शहरों के स्मार्ट सिटी प्लान पर निर्भर करेगा। इस साल के आखिर तक 20 शहरों को स्मार्ट सिटीज के लिए चुना जाएगा, जबकि बाकी 80 शहरों के चयन का काम 2017-18 तक पूरा कर लिया जाएगा।

रैंकिंग में सबसे ऊपर आए 20 स्मार्ट सिटीज के बाद बाकी 80 शहरों को खुद के प्लान में सुधार का मौका दिया जाएगा। 100 स्मार्ट सिटीज के अलावा देशभर से अब तक 476 शहरों की पहचान अमृत योजना के लिए की गई है। ये सारे शहर कम से कम एक लाख की आबादी वाले होंगे। इन शहरों को बुनियादी सुविधाएं विकसित करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से मदद मिलेगी।

स्मार्ट सिटी के वितरण की समीक्षा मिशन के कार्यान्वयन के दो साल बाद की जाएगी। चुनौती में राज्यों/शहरी स्थानीय निकायों के प्रदर्शन के आकलन के आधार पर राज्यों के बीच शेष संभावित स्मार्ट शहरों में से कुछ का पुन:आवंटन शहरी विकास मंत्रालय द्वारा किया जा सकेगा।

स्मार्ट सिटी मिशन एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में संचालित किया जाएगा और केंद्र सरकार द्वारा मिशन को पांच साल में 48,000 करोड़ रुपये, करीब प्रति वर्ष प्रति शहर 100 करोड़ रुपये औसत वित्तीय सहायता देने का प्रस्ताव है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि व्यापक विकास भौतिक, संस्थागत, सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे को एकीकृत करके ही होता है। 

सरकार की कई क्षेत्रीय योजनाएं इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए शामिल होती हैं, भले ही उनके रास्ते अलग हैं। शहरी योजनाओं के स्वरूप में बदलाव करके उन्हें अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस शहर में तब्दील करने में अमृत और स्मार्ट सिटी मिशन एक-दूसरे के पूरक साबित होने वाले हैं।

हर कोई चाहता है कि वे स्मार्ट सिटी के निवासी कहलाएं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक शहर आखिर स्मार्ट कब कहलाता है? इस सवाल का जवाब कुछ शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, क्योंकि सरकार से लेकर इन योजनाओं पर काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां और आम लोग सबका जवाब अलग-अलग होगा। हर शहर की अपनी संस्कृति और अपना चरित्र होता है। हर शहर की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं।

कई शहर बसावट में ही काफी जटिल और दुर्गम होते हैं और कुछ शहर काफी सहज होते हैं। स्मार्ट सिटी शब्द सुनते ही सबसे पहले जो तस्वीर उभरती है, वह कुछ ऐसी होती है : एक शहर जहां की जलवायु शुद्ध हो, लोग खुली हवा में सांस ले सकें। बिजली-पानी की सप्लाई 24 घंटे सुचारु हो, दिनभर लोगों को ट्रैफिक में न जूझना पड़े, सार्वजनिक यातायात उपलब्ध हो जो विश्व स्तरीय हो, बुनियादी सुविधाएं व्यापक हों। सड़कें, इमारतें, शापिंग मॉल, सिनेप्लैक्स सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से बने हों। अनधिकृत कालोनियों की सड़ांध मारती गलियां न हों। झुग्गी-बस्तियां न हों। कुछ ऐसा शहर दिखे जहां लोगों के रहन-सहन में समानता दिखे।

भारत जैसे शहरों जिनकी सही मैपिंग तक उपलब्ध नहीं, जिनमें अवैध कब्जों की भरमार हो, शहरों का बेतरतीब निर्माण हो चुका हो, ऐसे शहरों को स्मार्ट बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं। भविष्य के शहर में बिजली के ग्रिड से लेकर सीवर पाइप, सड़कें, कारें और इमारतें हर चीज एक एक नेटर्वर्क से जुड़ी होगी।

इमारत अपने आप बिजली बंद करेगी, स्वचालित कारें खुद अपने लिए पार्किं ग ढूंढेंगी और यहां तक कि कूड़ादान भी स्मार्ट होगा, लेकिन सवाल यह है कि हम इस स्मार्ट भविष्य में कैसे पहुंच सकते हैं? शहर में हर इमारत, बिजली के खंभे और पाइप पर लगे सेंसरों पर कौन निगरानी रखेगा और कौन उन्हें नियंत्रित करेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि शहरों को स्मार्ट बनने की जरूरत है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करेगी, जिससे यातायात व्यवस्था, आपातकालीन सेवाओं और अन्य व्यवस्थाओं पर जबर्दस्त दबाव होगा। 

सच्चाई यह है कि दुनियाभर में इस समय जो स्मार्ट शहर बन रहे हैं, वे बहुत छोटे हैं। इन शहरों के बारे में काफी चर्चा हो रही है, लेकिन उनके पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिससे वास्तव में लोगों की जिंदगी में बदलाव आ रहा है। 

हालांकि अगले पांच सालों में चीजें स्मार्ट हो जाएंगी, तब उन शहर का डेटा इंफ्रास्ट्रक्च र ट्रेनों और सड़कों की तरह अहम हो जाएगा। ऐसा नहीं कि भारत स्मार्ट सिटी की ओर अग्रसर होने वाला पहला देश है, इससे पहले से कई देशों में स्मार्ट सिटी परियोजनाएं बेहतरीन तरीके से क्रियान्वित की जा चुकी हैं। 

भारत में भी यदि इसे संजीदगी से अमल किया जाए तो इसे मोदी सरकार की बेहतरीन पहल कही जा सकती है, बशर्ते सरकार सामंजस्य बिठाने के लिए गांवों को भी स्मार्ट बनाने का प्रयास करे। 

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